
देहरादून/उधम सिंह नगर। 1 सितम्बर, उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास का वह दिन, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज से ठीक 31 साल पहले, यानी 1 सितम्बर 1994 को उधम सिंह नगर जिले के खटीमा नगर में शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे निहत्थे लोगों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चला दी थीं। इस खटीमा गोलीकांड में 7 से 8 आंदोलनकारियों ने शहादत दी और सैकड़ों घायल हो गए। यह घटना आज भी उत्तराखंड की आत्मा को झकझोर देती है।
1990 के दशक की शुरुआत में उत्तराखंड अलग राज्य की मांग तेज़ हो चुकी थी। पहाड़ के गाँव–गाँव से लोग रोज़गार, शिक्षा, पलायन और उपेक्षा के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे थे। 1 सितम्बर 1994 को राज्य आंदोलनकारियों ने खटीमा के रामलीला मैदान में विशाल प्रदर्शन और जुलूस का आयोजन किया। इसमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और पूर्व सैनिक बड़ी संख्या में शामिल हुए।
यह जुलूस शांतिपूर्वक तहसील और थाने के सामने से गुजर रहा था। लेकिन अचानक पुलिस ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के फायरिंग शुरू कर दी। गवाहों के मुताबिक पुलिस ने लगभग 60 राउंड गोलियां चलाईं। आंदोलनकारी घबराकर इधर-उधर भागे, लेकिन कई लोग मौके पर ही जान गवां बैठे। भगदड़ में दर्जनों घायल हुए। आरोप यह भी लगे कि कुछ शहीद आंदोलनकारियों के शवों को छुपाने के लिए पुलिस ने पास की नदियों में बहा दिया।
शहीद आंदोलनकारियों के नाम
इस गोलीकांड में जिन सपूतों ने अपने प्राण गंवाए, उनके नाम आज भी पूरे उत्तराखंड में श्रद्धा और सम्मान से लिए जाते हैं—
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प्रताप सिंह
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सलीम अहमद
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भगवान सिंह
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धर्मानंद भट्ट
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गोपीचंद
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परमजीत सिंह
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रामपाल
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भुवन सिंह
खटीमा गोलीकांड ने उत्तराखंड आंदोलन को और अधिक प्रज्वलित कर दिया। इस घटना ने पूरे राज्य में गुस्से और आक्रोश की लहर फैला दी। आंदोलन अचानक तेज़ हो उठा और ठीक अगले ही दिन, 2 सितम्बर 1994 को मसूरी गोलीकांड घटित हुआ।
विशेषज्ञ मानते हैं कि खटीमा गोलीकांड ने ही आंदोलन को निर्णायक मोड़ पर पहुँचा दिया और राज्य निर्माण की नींव को और मजबूत किया।
खटीमा गोलीकांड को आज भी उत्तराखंड आंदोलन का “काला दिन” कहा जाता है। यह केवल एक त्रासदी नहीं थी, बल्कि वह बिंदु था जिसने पूरे पहाड़ और तराई के लोगों को एकजुट कर दिया। शहीदों की शहादत ने इस बात को साबित कर दिया कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल मांग नहीं, बल्कि जनभावनाओं की गहराई से उपजा संघर्ष था।
वह घाव और पीड़ा आज भी स्मृतयों में शेष है
31 साल बाद भी यह घटना लोगों की स्मृतियों में ज़िंदा है। हर साल इस दिन शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। उत्तराखंड के लोग इस बलिदान को न केवल याद करते हैं, बल्कि इसे अपने राज्य के अस्तित्व की सबसे बड़ी नींव मानते हैं।
शहीद परिवार आज भी न्याय और उचित मान्यता की उम्मीद रखते हैं। जबकि समाज के बड़े हिस्से का मानना है कि अगर खटीमा और मसूरी जैसे बलिदान न हुए होते, तो शायद उत्तराखंड आज अलग राज्य न बन पाता।
खटीमा गोलीकांड केवल इतिहास की एक तारीख नहीं है, यह उत्तराखंड की आत्मा पर अंकित घाव और बलिदान का प्रतीक है। 31 साल बाद भी यह दिन हमें याद दिलाता है कि यह राज्य शहीदों के लहू से बना है।
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