
पुस्तकों को पैर से क्यों नहीं छूना चाहिए? (Why Should We Avoid Touching Books With Our Feet?)
Books: भारतीय संस्कृति और परंपरा में हर वस्तु को आदर देने की शिक्षा दी जाती है। हवा को “वायु देव”, सूर्य को “सूर्य देव” और वर्षा को “इंद्र देव” के रूप में पूजने की परंपरा है। उसी तरह शिक्षा से जुड़ी वस्तुएं — जैसे किताबें, पेन, कॉपी, संगीत वाद्य और कंप्यूटर — विद्या की देवी माँ सरस्वती का प्रतीक मानी जाती हैं।
इन्हें पैर से छूना या अपवित्र करना ज्ञान की देवी का अपमान माना जाता है।
ज्ञान का प्रतीक – पुस्तक (Book as a Symbol of Knowledge)
हमारे शास्त्रों में ज्ञान को सर्वोच्च शक्ति बताया गया है — “विद्या विनयेन शोभते” यानी विनम्रता से अर्जित ज्ञान ही मनुष्य को सुंदर बनाता है।
प्राचीन भारत में गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी। वहाँ विद्यार्थी पुस्तकों को नहीं, बल्कि ताड़पत्रों पर लिखे ग्रंथों को पूजते थे।
समय के साथ यही ग्रंथ “किताबों” के रूप में आए और आज हमारे लिए वही ज्ञान का माध्यम हैं।
जब हम किताब को पैर से छूते हैं, तो यह उसी देवी सरस्वती का अपमान होता है जो उसमें वास करती हैं।
पैर शरीर का सबसे अशुद्ध हिस्सा क्यों माना गया? (Why Feet Are Considered the Dirtiest Part of the Body?)
भारतीय परंपरा में पैर को शरीर का सबसे अशुद्ध हिस्सा माना गया है, क्योंकि ये धूल, मिट्टी और गंदगी के संपर्क में सबसे अधिक रहते हैं।
जब हम किसी पवित्र वस्तु को पैरों से छूते हैं, तो यह असम्मान का प्रतीक होता है।
इसी कारण से हम बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं, लेकिन किसी भी धार्मिक या शिक्षण वस्तु को पैर से छूने से बचते हैं।
माँ सरस्वती का निवास ज्ञान में होता है (Saraswati Devi Resides in Knowledge)
कहा जाता है कि जहाँ ज्ञान होता है, वहाँ देवी सरस्वती का वास होता है।
इसलिए किताबें, पेन, वाद्ययंत्र, कंप्यूटर — सभी में उनका प्रतीकात्मक अस्तित्व है।
जब हम किताब को पैर से छूते हैं, तो यह देवी के प्रति अवमानना मानी जाती है।
इसलिए जब कभी गलती से किताब पैर से छू जाए, तो लोग उसे हाथ से छूकर आँखों से लगाते हैं। यह देवी सरस्वती से क्षमा मांगने का पारंपरिक तरीका है।
अज्ञान से ज्ञान की ओर – एक सांस्कृतिक यात्रा (From Ignorance to Knowledge – A Cultural Journey)
भारतीय संस्कृति में शिक्षा केवल नौकरी या करियर का साधन नहीं थी, बल्कि आत्मा की उन्नति का मार्ग थी।
“तमसो मा ज्योतिर्गमय” — यानी अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला ज्ञान ही सर्वोच्च पूजा है।
इसलिए किताब को छूते समय भी आदर का भाव रखना हमारे अंदर संस्कार और अनुशासन का प्रतीक है।
शास्त्रों में पुस्तकों के प्रति सम्मान का महत्व (Importance of Respecting Books in Scriptures)
वेद और पुराणों में कई स्थानों पर ज्ञान के प्रति सम्मान की बात कही गई है।
माँ सरस्वती को हमेशा वीणा, पुस्तक और माला के साथ दर्शाया गया है।
यह इस बात का संकेत है कि विद्या और संगीत, दोनों आत्मा को शुद्ध करते हैं।
इसलिए जब हम किताब का अपमान करते हैं, तो यह देवी के आशीर्वाद से वंचित होने जैसा है।
विद्या का मार्ग विनम्रता से खुलता है (Knowledge Opens Through Humility)
“विद्या ददाति विनयं” — यानी विद्या विनम्रता देती है।
यदि हम अहंकार या असम्मान के भाव से शिक्षा को ग्रहण करेंगे, तो उसका फल नहीं मिलेगा।
किताबों के प्रति आदर दिखाना, उन्हें स्वच्छ रखना और पैर से दूर रखना यही हमारी विनम्रता को दर्शाता है।
जब गलती से किताब पैर से छू जाए तो क्या करें? (What to Do If a Book Is Touched by Feet Accidentally?)
कई बार अनजाने में किताब या कॉपी पैर से छू जाती है।
ऐसी स्थिति में तुरंत उस किताब को उठाकर दोनों हाथों से छूकर आँखों या माथे से लगाना चाहिए।
यह कार्य देवी सरस्वती के प्रति क्षमा याचना का प्रतीक है और दर्शाता है कि आप उस गलती को स्वीकार कर रहे हैं।
शिक्षा में श्रद्धा का भाव क्यों ज़रूरी है? (Why Reverence Is Essential in Education?)
शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं है, बल्कि विवेक और संस्कारों को आत्मसात करना है।
जब हम अपने ज्ञान स्रोत — यानी किताबों — का आदर करते हैं, तो यह हमारे अंदर अनुशासन और समर्पण का भाव जगाता है।
यह वही भाव है जो विद्यार्थी को “विद्यार्थी” बनाता है।
सरस्वती पूजा का महत्व (Significance of Saraswati Puja)
भारत के कई हिस्सों में सरस्वती पूजा, दशहरा और आयुध पूजा के दौरान विद्यार्थी अपनी किताबें पूजा के लिए रखते हैं।
उस दिन कोई भी किताब नहीं पढ़ता या छूता, क्योंकि माना जाता है कि उस दिन देवी स्वयं उसमें विराजमान होती हैं।
पूजा के बाद जब किताबें वापस ली जाती हैं, तो लोग उन्हें माथे से लगाकर देवी का आशीर्वाद लेते हैं।
पश्चिमी देशों में भी किताबों का सम्मान (Book Respect in Other Cultures Too)
केवल भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों में भी किताबों के प्रति आदर की भावना होती है।
जापान में विद्यार्थी किताबों को “ज्ञान का मंदिर” मानते हैं।
यह साबित करता है कि ज्ञान का आदर किसी एक धर्म या संस्कृति का नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का हिस्सा है।
कर्म और ज्ञान का संबंध (Connection Between Karma and Knowledge)
हमारे कर्म और हमारा ज्ञान एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।
यदि हम अपने ज्ञान स्रोत का सम्मान नहीं करेंगे, तो वह ज्ञान कभी स्थायी नहीं होगा।
किताब को पैर से न छूना, उसे साफ रखना, और अध्ययन से पहले “सरस्वती वंदना” करना — ये सब कर्म हमें आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाते हैं।
सरस्वती वंदना का महत्व (Importance of Saraswati Vandana)
किसी भी अध्ययन या परीक्षा से पहले यह मंत्र पढ़ना शुभ माना जाता है —
“सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥”
इसका अर्थ है — “हे देवी सरस्वती! मैं आपका नमन करता हूँ। कृपया मेरे अध्ययन को सिद्धि प्रदान करें।”
यह मंत्र मन को शांत करता है और अध्ययन में एकाग्रता बढ़ाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
पुस्तकें सिर्फ़ काग़ज़ नहीं होतीं, बल्कि उनमें ज्ञान, अनुभव और दिव्यता का संगम होता है।
पैर से किताब छूना केवल एक शारीरिक गलती नहीं, बल्कि संस्कारों की भूल मानी जाती है।
इसलिए अपने बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि किताबें आदर की वस्तु हैं —
उन्हें पैर से नहीं, मन से छूना चाहिए।
किताबों का सम्मान करना, दरअसल, ज्ञान, गुरु और देवी सरस्वती का सम्मान करना है।
और जब हम ज्ञान का आदर करते हैं, तो वही ज्ञान हमें जीवन में ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।
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