
रुद्रप्रयाग में बायो फेंसिंग से जंगली जानवरों पर लगेगी रोक
रुद्रप्रयाग जिले में बढ़ती वन्य जीवों की सक्रियता और खेती को हो रहे भारी नुकसान के बीच वन विभाग ने अब बायो फेंसिंग के जरिए एक ठोस पहल शुरू की है। इसका उद्देश्य जंगली जानवरों के खेतों में प्रवेश को रोकना और किसानों को राहत देना है।
जिन क्षेत्रों में जंगली जानवरों की संख्या अधिक है और फसल को लगातार नुकसान हो रहा है, वहां अब प्राकृतिक तरीके से सुरक्षा घेरा तैयार किया जा रहा है। इसके तहत खेतों और गांवों की सीमाओं से सटे वन क्षेत्रों में कंटीली झाड़ियों को उगाया जा रहा है, जिससे जानवरों की आवाजाही पर प्रभावी रोक लग सके।
क्या है बायो फेंसिंग और कैसे करती है काम
बायो फेंसिंग एक प्राकृतिक और टिकाऊ तकनीक है, जिसमें कंटीले पौधों की घनी पंक्तियां लगाकर खेतों के चारों ओर एक मजबूत जैविक दीवार तैयार की जाती है।
इस योजना के तहत रामबांस, हिसार, किंनगोडा और किल्मोड़ा जैसे पौधों को पांच पंक्तियों में लगाया जा रहा है। ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं और घना व कंटीला स्वरूप ले लेते हैं, जिससे जंगली जानवर खेतों में प्रवेश नहीं कर पाते।
जिले की सभी छह रेंज में शुरू हुआ काम
वन विभाग ने इस योजना को जनपद की सभी छह रेंजों में लागू करना शुरू कर दिया है। इनमें खांकरा, रुद्रप्रयाग, अगस्त्यमुनि, उत्तरी जखोली, दक्षिणी जखोली और गुप्तकाशी शामिल हैं।
पिछले वर्ष जखोली के डांगी क्षेत्र में इसका सफल प्रयोग किया जा चुका है, जहां इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए थे। इसी को देखते हुए अब इसे बड़े स्तर पर लागू किया जा रहा है।
किसानों को मिलेगा सीधा फायदा
बायो फेंसिंग से सबसे बड़ा लाभ किसानों को होगा। फसलों को जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान में कमी आएगी, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और आर्थिक नुकसान घटेगा।
इसके अलावा यह पहल मानव-वन्यजीव संघर्ष को भी कम करेगी, जो पहाड़ी क्षेत्रों में एक बड़ी समस्या बन चुका है।
पर्यावरण और आजीविका दोनों को लाभ
इस योजना का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है। बायो फेंसिंग से पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।
इन कंटीले पौधों के औषधीय गुण भी होते हैं, जिससे ग्रामीणों के लिए आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। यानी यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगी।
सोलर फेंसिंग और दीवार भी बन रही
वन विभाग द्वारा बायो फेंसिंग के साथ-साथ सोलर फेंसिंग और सुअर रोधी दीवार का निर्माण भी किया जा रहा है। इन उपायों के जरिए जंगली जानवरों के हस्तक्षेप को पूरी तरह नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।
अधिकारी का बयान
वन विभाग के एसडीओ देवेंद्र सिंह पुंडीर ने बताया कि बायो फेंसिंग के तहत लगाए गए पौधे लगभग 5 से 6 वर्षों में पूरी तरह विकसित हो जाएंगे। इसके बाद यह एक मजबूत प्राकृतिक सुरक्षा घेरा बन जाएंगे, जिससे ग्रामीणों को जंगली जानवरों से राहत मिलेगी और पर्यावरण को भी लाभ पहुंचेगा।
क्या है बायो फेंसिंग? (Featured Snippet)
बायो फेंसिंग एक प्राकृतिक तकनीक है, जिसमें कंटीले पौधों को खेतों की सीमा पर लगाकर जंगली जानवरों के प्रवेश को रोका जाता है।
निष्कर्ष
रुद्रप्रयाग में शुरू की गई बायो फेंसिंग योजना एक दीर्घकालिक और प्रभावी समाधान के रूप में सामने आ रही है। यह पहल किसानों की फसलों को सुरक्षा देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती देगी।
यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले समय में उत्तराखंड के अन्य जिलों में भी इसे लागू किया जा सकता है, जिससे व्यापक स्तर पर किसानों को लाभ मिलेगा।
FAQ –
Q1. बायो फेंसिंग कितने समय में तैयार होती है?
लगभग 5 से 6 वर्षों में पौधे पूरी तरह विकसित हो जाते हैं।
Q2. इसमें कौन-कौन से पौधे लगाए जाते हैं?
रामबांस, हिसार, किंनगोडा और किल्मोड़ा जैसे कंटीले पौधे लगाए जाते हैं।
Q3. क्या यह जंगली जानवरों को पूरी तरह रोक सकती है?
यह काफी हद तक प्रभावी होती है, खासकर जब इसे सोलर फेंसिंग और अन्य उपायों के साथ उपयोग किया जाए।
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