Pauri Garhwal: अरोमा मिशन से बदल रही है पहाड़ों की तस्वीर – सगंध खेती ने दी किसानों को नई राह

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Pauri Garhwal: पहाड़ों में खेती अब सिर्फ गुजारे का साधन नहीं रही, बल्कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक प्रगति की नई राह बन गई है। भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के तहत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (IIIM), जम्मू द्वारा संचालित अरोमा मिशन ने उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में किसानों की तक़दीर बदल दी है।

गढ़वाल मंडल के पौड़ी, उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों के 26 गांवों के 1500 से अधिक किसान अब पारंपरिक खेती छोड़कर लैवेंडर, रोजमेरी जैसी औषधीय सुगंधित फसलों की खेती कर रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन और जंगली जानवरों से सुरक्षित विकल्प
जहां एक ओर परंपरागत खेती जलवायु परिवर्तन और जंगली जानवरों के कारण संकट में है, वहीं लैवेंडर जैसी सुगंधित फसलें किसानों के लिए सुरक्षित और लाभकारी विकल्प बन रही हैं। लैवेंडर की तेज़ खुशबू से जंगली जानवर दूर रहते हैं, जिससे फसल सुरक्षित रहती है। साथ ही यह खेती कम पानी, कम खाद और कम मेहनत में तैयार हो जाती है।

किसानों के जीवन में बड़ा बदलाव
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुफला गुप्ता के अनुसार, शुरू में किसानों को सगंध खेती की ओर आकर्षित करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन सफलता की शुरुआती कहानियों ने बाकी किसानों को भी प्रेरित किया। आज कई गांवों में किसान समूह बनाकर लैवेंडर और रोजमेरी की खेती कर रहे हैं।

परियोजना सहायक कमलेश नेगी बताते हैं कि इस मिशन में महिलाओं की भागीदारी सबसे अहम है। गांवों में कई स्वयं सहायता समूह की महिलाएं न सिर्फ खेती बल्कि फसल की प्रोसेसिंग और पैकेजिंग में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इससे उन्हें आर्थिक मजबूती के साथ आत्मनिर्भरता भी मिली है।

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बाजार की सीधी पहुंच, बिचौलियों से मुक्ति
पहाड़ी क्षेत्रों में किसान अपनी उपज बेचने के लिए अब बाजार की चिंता नहीं करते। अरोमा मिशन के तहत एग्रो वोल्टिक पावर सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड के साथ बाय-बैक एग्रीमेंट किया गया है। इस करार के तहत कंपनी किसानों से सीधे फसल बाजार दर पर खरीदती है। हाल ही में 500 किलो लैवेंडर बड्स और 1000 किलो रोजमेरी की खरीदारी की गई, जिसकी कीमत 6-8 लाख रुपये आंकी गई। यह मॉडल किसानों को उचित दाम के साथ पारदर्शी और स्थायी बाजार उपलब्ध करा रहा है।

वैज्ञानिक खेती से आय में बढ़ोतरी
डॉ. जबीर अहमद, निदेशक IIIM जम्मू के अनुसार, संस्थान की टीम किसानों को खेत में पौधे लगाने से लेकर तेल निष्कर्षण और मार्केटिंग तक पूरा व्यावहारिक प्रशिक्षण दे रही है। परिणामस्वरूप परंपरागत खेती की तुलना में किसानों की आमदनी में कई गुना बढ़ोतरी हुई है।

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विज्ञान को खेत तक पहुंचाने का लक्ष्य
डॉ. सुफला गुप्ता कहती हैं, “हमारा उद्देश्य प्रयोगशाला तक सीमित नहीं, बल्कि विज्ञान को खेतों तक पहुंचाना है। उत्तराखंड में अरोमा मिशन की सफलता इसका प्रमाण है। राज्य सरकार भी इस मिशन को अन्य जिलों में विस्तारित करने की दिशा में काम कर रही है।”

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किसान ऐसे जुड़ सकते हैं अरोमा मिशन से
अगर कोई किसान लैवेंडर या अन्य सगंध पौधों की खेती से जुड़ना चाहता है तो वह sgupta@iiim.res.in पर ईमेल कर या मोबाइल नंबर 8958788121 पर संपर्क कर सकता है। IIIM जम्मू पौध, प्रशिक्षण और मार्केटिंग में भी हर स्तर पर किसानों को सहयोग दे रहा है।

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सगंध खेती – आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम
अरोमा मिशन ने यह साबित कर दिया है कि अगर वैज्ञानिक खेती को सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध हो तो पर्वतीय क्षेत्रों में खेती को आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बनाया जा सकता है। आने वाले वर्षों में इस मिशन के विस्तार से उत्तराखंड के कई और किसानों की किस्मत बदलने की उम्मीद है।

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