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शराब के ठेके खुले पर पुस्तकालय बंद, क्या ऐसे बनेगा उत्तराखंड?

Deepak Bisht November 9, 2024 1 min read
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शराब के ठेके खुले पर पुस्तकालय बंद, क्या ऐसे बनेगा उत्तराखंड?

उत्तराखंड के लिए यह साल विशेष है—राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर सरकार इसे “रजत जयंती” के रूप में मना रही है, जोकि किसी भी राज्य के लिए गर्व का अवसर होता है। 25 वर्षों की इस यात्रा में विकास के कई आयाम गढ़ने का दावा किया गया है। मगर, जब हम इस विकास यात्रा को गहराई से परखते हैं, तो कई क्षेत्रों में ठहराव और पिछड़ापन नज़र आता है। इनमें से एक अहम क्षेत्र है शिक्षा। उत्तराखंड का शिक्षा तंत्र केवल मैदानी इलाकों तक सीमित हो गया है। पहाड़ी इलाकों में जहां भी शिक्षा के साधन उपलब्ध हैं, वे या तो उपेक्षा की धूल खा रहे हैं, या फिर सरकारी नियमों और बाधाओं के चलते बंद होने के कगार पर हैं।

शराब के ठेके खुले, पर शिक्षा के मंदिर बंद

उत्तराखंड में शराब के ठेके हर दिन सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक खुले रहते हैं, बिना किसी अवरोध के। हफ्ते के सातों दिन शराब की दुकानों में रौनक रहती है। परंतु शिक्षा के मंदिर, जिनमें पुस्तकालय भी शामिल हैं, उन्हें सरकारी तंत्र की अनदेखी का सामना करना पड़ रहा है। यह एक विडंबना ही है कि जहाँ राज्य के युवा बेहतर शिक्षा और अवसरों की तलाश में बाहर जाते हैं, वहीं जो युवा राज्य के पहाड़ी जिलों में रह जाते हैं, वे सरकारी तंत्र के आगे अपने भविष्य को धुंधला होते देख रहे हैं।

रुद्रप्रयाग का सरकारी पुस्तकालय इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। यह पुस्तकालय सरकारी व्यवस्था के बढ़ते हस्तक्षेप, नियम-कायदों और आर्थिक संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। स्थिति यह हो गई है कि छात्रों की प्रेरणा और उत्साह को कुचलने में इस सरकारी तंत्र का अहम योगदान है। रुद्रप्रयाग का यह सरकारी पुस्तकालय महज एक उदाहरण है; ऐसा हाल राज्य के अन्य सरकारी पुस्तकालयों का भी है।

सरकारी उपेक्षा से जूझते पुस्तकालय

सरकारी पुस्तकालयों की दशा देखकर ऐसा लगता है कि सरकारी तंत्र ने उन्हें अनदेखा कर दिया है। इन पुस्तकालयों में पुस्तकों की कमी है, नए संसाधनों का अभाव है, और कई जगह तो पुस्तकालयों की देखरेख के लिए कोई कर्मचारी तक नहीं है। इसके अतिरिक्त, सरकार द्वारा लगाए गए सख्त नियम और वित्तीय बाधाएं इन पुस्तकालयों के अस्तित्व को ही खतरे में डाल रही हैं।

रुद्रप्रयाग का सरकारी पुस्तकालय एक ऐसा ही उदाहरण है, जो सरकारी उपेक्षा और नियम-कायदों के जाल में उलझ कर छात्र समुदाय के उत्साह को तोड़ने का काम कर रहा है।  रुद्रप्रयाग का सरकारी पुस्तकालय सुविधाजनक बैठने की व्यवस्था के बावजूद, सरकारी छुट्टियों के कारण छात्रों के लिए खुला नहीं रह पाता। आए दिन सरकारी छुट्टियों के चलते यह पुस्तकालय बंद रहता है, जिससे वहां पढ़ने आने वाले छात्र काफी परेशान हैं।

छात्रों का कहना है कि उन्हें पढ़ाई के लिए सुलभ समय और वातावरण नहीं मिल पाता क्योंकि आए दिन की छुट्टियों के कारण पुस्तकालय बंद कर दिया जाता है। यह समस्या केवल रुद्रप्रयाग तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य कई जिलों के पुस्तकालय भी इसी तरह की कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। वहां के स्थानीय विद्यार्थियों के अनुसार, पुस्तकालय में नियमित समय पर नई किताबों की कमी है, इंटरनेट की सुविधा नहीं है और सरकारी छुट्टियों के कारण पुस्तकालय का बार-बार बंद होना उन्हें काफी असुविधाजनक लगता है।

शिक्षा की दिशा में पिछड़ता उत्तराखंड

उत्तराखंड में शिक्षा के नाम पर अब तक जो भी कार्य हुए हैं, वे केवल मैदानी इलाकों तक सीमित रहे हैं। पहाड़ों में शिक्षा के जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, वे या तो उपेक्षित हैं, या फिर संसाधनों की कमी के चलते धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। पहाड़ों के सरकारी विद्यालयों और पुस्तकालयों की स्थिति यह है कि वे या तो सरकारी नियमों के बोझ तले दबे हुए हैं या फिर वे बंद होने के कगार पर हैं।

यह विडंबना है कि सरकार एक ओर उत्तराखंड को विकसित राज्य बनाने का सपना युवाओं के कंधे पर सौंप रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा के मंदिरों का सरकारी हस्तक्षेप से सत्यानाश हो रहा है। पुस्तकालय, जो समाज की बौद्धिक उन्नति का आधार होते हैं, उन्हें नजरअंदाज करना राज्य के भविष्य के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।

विकसित उत्तराखंड का सपना कैसे होगा साकार?

सरकार ने उत्तराखंड को एक विकसित राज्य बनाने का सपना युवाओं के कंधों पर डाला है, परंतु यह सपना केवल तब ही पूरा हो सकता है जब राज्य में शिक्षा और पुस्तकालयों का सही ढंग से संचालन हो। पुस्तकालय केवल पढ़ाई के लिए ही नहीं होते, वे समाज के बौद्धिक विकास का आधार भी होते हैं। इसीलिए, यह आवश्यक है कि राज्य के सभी पुस्तकालयों को सही ढंग से संचालित किया जाए और छात्रों को वहां उपलब्ध सभी सुविधाएं दी जाएं।

वर्तमान में, राज्य के पुस्तकालय सरकारी तंत्र के हस्तक्षेप और आर्थिक सीमाओं के कारण छात्रों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या शराब के ठेके राज्य के विकास का प्रतीक हैं या फिर ये सरकारी पुस्तकालय जो गरीब और साधारण बच्चों के लिए बड़े शहरों की महंगी व्यवस्था से बचने का अवसर प्रदान कर सकते हैं। यह हम सभी को मिलकर तय करना होगा कि हम अपने राज्य का कैसा भविष्य चाहते हैं।

 

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Deepak Bisht

Hi, I am Deepak – a journalist, passionate blogger, and writer with over 10 years of experience in content writing and journalism. Over the years, I have worked with some reputed news portals and blogs as both a permanent writer and a freelance contributor.

My books are available on Amazon Kindle, and through my writing, I aim to blend storytelling with real issues and cultural narratives.

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