
नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका—तीनों देशों में हालिया तख़्तापलट की घटनाओं ने दुनिया का ध्यान खींचा है। सवाल यह नहीं कि इसके पीछे कौन-सी बड़ी ताक़त थी, बल्कि यह है कि इन तीनों देशों में एक जैसी तस्वीर देखने को मिली—क्रांति की शुरुआत नौजवानों ने की और गुस्से का शिकार बने नेता।
नेताओं के करोड़ों कमाने का कोई फ़ायदा नहीं रहा, जब जनता ने उन्हें घरों से घसीटकर सड़कों पर पीटा। यही सबक भारत के सामने भी खड़ा है—रोज़गार के बजाय ठेकेदारी और पीआर पर ज़्यादा ध्यान देने वाली राजनीति कितनी टिकाऊ है? जिस दिन फ़ेसबुक और यूट्यूब बंद हुए, उस दिन बेरोज़गारी का असली आलम सामने आ सकता है।
भारत का मीडिया भी इन घटनाओं को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें प्रचार का साधन बना रहा है। किसी ने लिखा—“शुक्र है मोदी हैं, ओली नहीं।” तो कोई इसे बाहरी ताक़तों की साज़िश बताने लगा। मगर असली वजह कोई सामने लाने को तैयार नहीं—जनता के भीतर वर्षों से पनप रहा असंतोष और विद्रोह।
म्यांमार और बांग्लादेश को भले ही बाहरी हस्तक्षेप का शिकार माना जाए, लेकिन श्रीलंका और नेपाल इस समीकरण में फिट नहीं बैठते। सवाल यह भी है कि जिन गोरखा सैनिकों की वीरता की कहानियाँ हम सुनते आए हैं, उन्होंने नेपाल के नेताओं को क्यों नहीं बचाया? शायद इसलिए कि वे अपनी ऊर्जा ब्रिटिश सेना में ज़्यादा लगाते हैं, जबकि अपने लोकतंत्र की रक्षा के प्रति उदासीन हैं। लोकतंत्र कैसे खत्म होता है, इसका मूक दर्शक पूरा क्षेत्र बना हुआ है।
ऐसे हालात देखकर स्वर्गीय जनरल बिपिन रावत की बात याद आती है। उन्होंने भारत के सामने “टू फ्रंट” नहीं, बल्कि “थ्री फ्रंट वॉर” की आशंका जताई थी। बाहरी दुश्मनों के अलावा, देश के भीतर की चुनौतियों की ओर भी वे इशारा कर रहे थे। बेरोज़गारी शायद उनमें से सबसे बड़ी है। आज बड़ी संख्या में युवा अपनी आजीविका के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर हैं। कल्पना कीजिए, अगर किसी बाहरी साज़िश या अचानक सोशल मीडिया बैन के कारण यह सहारा छिन गया, तो हालात कितने भयावह हो सकते हैं।
मई 2025 में भारत में बेरोज़गारों की संख्या घटकर लगभग 3.18 करोड़ रही, जो अप्रैल 2025 में 3.62 करोड़ थी। हालाँकि, इन आँकड़ों को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि भारत में रोज़गार की परिभाषा काफी लचीली है। Periodic Labour Force Survey (PLFS) के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने पिछले 365 दिनों में कम-से-कम 30 दिन कोई काम किया हो (Usual Status) या पिछले 7 दिनों में कम-से-कम एक दिन/एक घंटे कार्य किया हो (Current Weekly Status), तो उसे रोज़गार प्राप्त माना जाता है। यानी दिहाड़ी मज़दूर से लेकर स्व-नियोजित और वेतनभोगी तक सभी इसमें शामिल हैं। इसीलिए बेरोज़गारी का वास्तविक असर अक्सर आधिकारिक आँकड़ों में पूरी तरह सामने नहीं आता।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया और डिजिटल इकोनॉमी भारत में रोजगार का नया स्रोत बन रही है। 2025 में सोशल मीडिया से जुड़ी औपचारिक नौकरियों (जैसे क्रिएटर, मैनेजर, एडिटर, मार्केटिंग) की संख्या 2.4 लाख से अधिक है और यह हर साल 8–12% की दर से बढ़ रही है। भारत में करीब 35–45 लाख डिजिटल क्रिएटर सक्रिय हैं, लेकिन इनमें से केवल 4.5–6 लाख ही नियमित आमदनी कमा पाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि 88% क्रिएटर सोशल मीडिया को फुल-टाइम आय का स्रोत नहीं मानते, जबकि केवल 12% ही इससे अपनी अधिकांश कमाई करते हैं। इसका मतलब यह है कि डिजिटल क्रिएटर इकोनॉमी भले ही तेज़ी से बढ़ रही हो, लेकिन स्थायी और व्यापक रोज़गार के रूप में इसकी पकड़ अभी सीमित है।
दूसरी ओर भारत के युवाओं में मानसिक तनाव भी तेजी से बढ़ रहा है। शैक्षिक दबाव, बेरोज़गारी, सामाजिक अपेक्षाएँ और परिवार की उम्मीदें उन्हें गहरे दबाव में धकेल रही हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि करीब 20–25% युवा डिप्रेशन, चिंता और तनाव जैसी मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन सामाजिक कलंक और हिचक के कारण अधिकतर सामने नहीं आते। रिपोर्ट्स बताती हैं कि हर दिन औसतन 28 छात्र आत्महत्या कर रहे हैं और 15–29 वर्ष आयु वर्ग में आत्महत्या मौत का प्रमुख कारण बन चुकी है। यह दर वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी है। जयपुर में किए गए एक अध्ययन में युवाओं में 58% चिंता, 48.5% अवसाद और 25.4% तनाव पाया गया। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और परामर्श की कमी इस संकट को और गहरा बना रही है।
सरकार को चाहिए कि वह पीआर और दिखावटी योजनाओं पर खर्च करने के बजाय शिक्षित बेरोज़गारों के लिए उनकी योग्यता के अनुरूप ठोस और स्थायी रोज़गार उपलब्ध कराए। आज जो हालात प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के हैं, वह बेहद निराशाजनक है—केंद्रीय हो या राज्य स्तर की परीक्षा, हर जगह अनिश्चितता, असफलताओं और निराशा का माहौल है। यह स्थिति सिर्फ़ युवाओं का भविष्य ही नहीं निगल रही, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को भी कमजोर कर रही है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो भारत का लोकतंत्र महज़ कागज़ी न रहकर एक टिकिंग टाइम बम बन सकता है, जिसका विस्फोट पूरे समाज को हिला देगा।
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