
कोटद्वार में ‘बाबा’ नाम पर विवाद : एक दुकान, एक नाम और शहर की शांति पर मंडराता सवाल
कोटद्वार में ‘बाबा’ नाम पर विवाद: उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले का कोटद्वार आमतौर पर शांत, धार्मिक और व्यापारिक संतुलन के लिए जाना जाता है। यहां विभिन्न समुदायों के लोग वर्षों से साथ रहते आए हैं। जनवरी 2026 के अंत में अचानक एक कपड़ों की दुकान के नाम को लेकर उठा विवाद पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गया। यह विवाद सिर्फ़ एक बोर्ड या शब्द तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने धार्मिक आस्था, सामाजिक अधिकार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को छू लिया। जिस दुकान को लेकर विवाद हुआ, वह पटेल मार्ग पर स्थित थी और दशकों से चल रही थी। पहले यह मामला स्थानीय बहस तक सीमित था, लेकिन सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद इसने साम्प्रदायिक रंग लेना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह मुद्दा संगठनों, पुलिस और आम नागरिकों तक पहुंच गया, जिससे शहर में कुछ समय के लिए तनावपूर्ण माहौल बन गया।
26 जनवरी को कैसे शुरू हुआ विवाद
पूरा घटनाक्रम 26 जनवरी 2026 को सामने आया, जब पटेल मार्ग स्थित “बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर” पर कुछ युवक पहुंचे। दुकान का संचालन एक मुस्लिम बुजुर्ग कर रहे थे। युवकों ने दुकान के नाम पर आपत्ति जताते हुए कहा कि “बाबा” शब्द स्थानीय हिंदू धार्मिक आस्था से जुड़ा है और इसे किसी विशेष समुदाय द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। दुकानदार ने जवाब दिया कि उनकी दुकान 30 वर्षों से इसी नाम से चल रही है और अब तक किसी ने आपत्ति नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी को नाम से समस्या है तो वे बोर्ड हटाने पर विचार कर सकते हैं। लेकिन बातचीत शांत रहने के बजाय तीखी बहस में बदल गई। धीरे-धीरे आवाज़ें तेज़ होने लगीं और माहौल तनावपूर्ण हो गया।
बहस से हाथापाई तक की स्थिति
नाम को लेकर शुरू हुई बहस जल्द ही नियंत्रण से बाहर हो गई। सड़क पर मौजूद अन्य लोग रुकने लगे और माहौल और अधिक गरमा गया। आरोप-प्रत्यारोप के बीच दोनों पक्षों में धक्का-मुक्की शुरू हो गई। यह स्थिति कुछ ही मिनटों में हाथापाई में बदलने के करीब पहुंच गई। आसपास के दुकानदारों और स्थानीय नागरिकों ने बीच-बचाव कर किसी तरह दोनों पक्षों को अलग किया। यदि समय रहते हस्तक्षेप न होता, तो स्थिति गंभीर रूप ले सकती थी। घटना में किसी के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना नहीं मिली, लेकिन विवाद के बाद इलाके में डर और तनाव का माहौल बन गया। इस पूरी घटना का वीडियो किसी ने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया, जो आगे चलकर पूरे मामले का सबसे अहम मोड़ साबित हुआ।
वीडियो वायरल और मामला तूल पकड़ता है
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही विवाद ने स्थानीय सीमा पार कर ली। व्हाट्सऐप, फेसबुक और अन्य प्लेटफॉर्म पर वीडियो तेजी से फैल गया। वीडियो में दुकान के नाम को लेकर हो रही बहस और तनावपूर्ण स्थिति साफ़ दिखाई दे रही थी। इसके बाद लोग अपने-अपने नजरिए से इस मुद्दे पर टिप्पणी करने लगे। कुछ लोग इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला बता रहे थे, तो कुछ इसे एक बुजुर्ग दुकानदार पर दबाव बनाने की कोशिश मान रहे थे। सोशल मीडिया पर बहस तेज़ होने से मामला और संवेदनशील हो गया। प्रशासन के लिए यह चिंता का विषय बन गया कि कहीं यह विवाद कानून-व्यवस्था को प्रभावित न कर दे। इसी दौरान संगठनों की सक्रियता भी बढ़ने लगी।
धार्मिक संदर्भ और ‘बाबा’ शब्द का महत्व
कोटद्वार में ‘बाबा’ शब्द को लेकर गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। यहां प्रसिद्ध सिद्धबली बाबा मंदिर स्थित है, जहां देशभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि सिद्धबली बाबा संकट और बाधाओं से रक्षा करते हैं। इसी कारण कई दुकानों और प्रतिष्ठानों के नामों में ‘बाबा’ शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है। विरोध करने वाले संगठनों का तर्क था कि यह शब्द स्थानीय धार्मिक पहचान से जुड़ा है और इसका गलत इस्तेमाल धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है। वहीं दूसरी ओर, कई लोगों का कहना था कि ‘बाबा’ शब्द किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है और वर्षों से इसका सामाजिक उपयोग होता आया है।
31 जनवरी को संगठनों का प्रदर्शन
वीडियो वायरल होने के अगले दिन, यानी 31 जनवरी 2026 को मामला और गंभीर हो गया। देहरादून सहित अन्य क्षेत्रों से बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कार्यकर्ता कोटद्वार पहुंचे। बड़ी संख्या में लोग जुलूस के रूप में पटेल मार्ग पर इकट्ठा हुए और दुकान का नाम बदलने की मांग करने लगे। नारेबाजी और प्रदर्शन के कारण क्षेत्र में तनाव बढ़ गया। हालात को देखते हुए पुलिस प्रशासन को अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ा। पुलिस का मुख्य उद्देश्य था कि किसी भी स्थिति में हिंसा न हो और दोनों पक्ष आमने-सामने न आएं।
पुलिस और प्रशासन की भूमिका
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गई। कोटद्वार पुलिस और वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। कोतवाली प्रभारी प्रदीप नेगी ने स्पष्ट बयान दिया कि किसी भी व्यक्ति या संगठन को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की और प्रदर्शनकारियों को समझाया। कुछ समय के लिए प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर धरना भी दिया, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप से हालात काबू में आ गए। प्रशासन ने आश्वासन दिया कि पूरे मामले की जांच निष्पक्ष रूप से की जाएगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।
दीपक कुमार की एंट्री और बहस का रुख बदलना
इसी दौरान एक स्थानीय युवक, जिम ट्रेनर दीपक कुमार, विवाद के बीच सामने आया। दीपक ने खुलकर बुजुर्ग दुकानदार का पक्ष लिया और कहा कि ‘बाबा’ शब्द किसी एक धर्म की बपौती नहीं है। जब भीड़ ने उससे नाम पूछा, तो उसने जानबूझकर अपना नाम “मोहम्मद दीपक” बताया। इस जवाब ने माहौल को और गर्म कर दिया, लेकिन साथ ही बहस को इंसानियत और अधिकारों की दिशा में मोड़ दिया। दीपक ने सवाल उठाया कि अगर दुकानदार मुस्लिम है तो उसका क्या कसूर है और वर्षों से चल रही दुकान पर अचानक आपत्ति क्यों की जा रही है।
दुकानदार की मजबूरी और सामाजिक प्रतिक्रिया
भीड़ और दबाव के बीच बुजुर्ग दुकानदार यह कहते सुने गए कि यदि किसी को आपत्ति है तो वे दुकान का नाम बदलने को तैयार हैं। यह बयान कई लोगों को चुभ गया। सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाया कि क्या डर के कारण किसी को अपनी पहचान बदलने पर मजबूर किया जाना चाहिए। दीपक कुमार के समर्थन में बड़ी संख्या में लोग सामने आए और उन्हें इंसानियत की मिसाल बताया। दूसरी ओर, कुछ लोगों ने धार्मिक भावनाओं की रक्षा की बात भी कही। इस तरह यह विवाद समाज में दो अलग-अलग सोच को सामने ले आया।
अंततः पुलिस की सक्रियता और प्रशासनिक हस्तक्षेप से कोटद्वार में स्थिति नियंत्रण में आ गई। किसी बड़े टकराव या हिंसा की घटना नहीं हुई। फिलहाल दुकान के नाम को लेकर कोई अंतिम प्रशासनिक आदेश सामने नहीं आया है और मामला जांच के दायरे में है। अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर शांति बनाए रखी गई। यह पूरा विवाद एक नाम से शुरू होकर सामाजिक सौहार्द, धार्मिक पहचान और नागरिक अधिकारों पर बहस में बदल गया। कोटद्वार ने फिलहाल शांति बचा ली, लेकिन यह घटना यह सवाल छोड़ गई कि क्या किसी को डर या दबाव के जरिए अपनी पहचान बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है।