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Uttarakhand ke Pramukh Loknrityan: उत्तराखण्ड के प्रमुख लोकनृत्य

Uttarakhand ke Pramukh Loknrityan: उत्तराखण्ड के प्रमुख लोकनृत्य

Uttarakhand ke Pramukh Loknrityan: क्या आपने कभी सोचा है कि जब गायन, वादन और नृत्य एक साथ मिलकर हमारी भावनाओं को स्पर्श करते हैं, तो उसे हम संगीत क्यों कहते हैं? मधुर ध्वनियों और सुरों का लयबद्ध होकर विशेष नियमों के तहत फूट पड़ना ही तो असली संगीत है। इंसान ही ऐसा जीव है जो अपने आस-पास की हर छोटी-बड़ी घटना को महसूस कर पाता है — और इन्हीं अनुभवों में कभी हर्ष, कभी दुःख, कभी गुस्सा तो कभी उत्साह भी छुपा होता है। ऐसे में जब मन के भीतर के ये भाव उमड़ने लगते हैं, तो इंसान उन्हें अक्सर संगीत के जरिए बाहर निकालता है। यही वजह है कि संगीत को मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का सबसे सुंदर जरिया कहा जाता है। मानव और संगीत का रिश्ता कोई नया नहीं, बल्कि उतना ही पुराना है जितनी उसकी खुद की कहानी। हर समाज का संगीत उसकी मिट्टी, संस्कृति, धर्म और इतिहास से जुड़ा होता है। अगर बात करें उत्तराखण्ड की, तो यहाँ के लोग संगीत को अपनी आत्मा मानते हैं। यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों और धुनों में पहाड़ की खुशबू बसती है। इस अध्याय में हम जानेंगे कि उत्तराखण्ड के प्रमुख लोकनृत्य कौन-कौन से हैं और कैसे श्री शिवानंद नौटियाल जैसे विद्वानों ने इन्हें संरक्षित किया है।

धार्मिक लोकनृत्य

क्या आपको पता है कि उत्तराखण्ड को देवभूमि क्यों कहा जाता है? इसका कारण है यहाँ की हर चोटी, हर जंगल, हर नदी में देवी-देवताओं का वास माना जाता है। यहाँ के लोग सिर्फ बड़े देवी-देवताओं में ही नहीं, बल्कि गाँव-गाँव के अपने लोक देवताओं में भी पूरा विश्वास रखते हैं। यही वजह है कि समय-समय पर इन देवताओं की पूजा और आह्वान के लिए खास नृत्य किए जाते हैं।

जब किसी पश्वा (देवता का माध्यम) में कोई देवता अवतरित होता है, तो वो खुद एक अलग ही अंदाज में नृत्य करता है। ऐसे नृत्य ही धार्मिक लोकनृत्य कहलाते हैं। नागर्जा, निरंकार, नरसिंह, भैरव, नंदा, उफराई देवी, हीत, मैमन्दा, हनुमान, घण्टाकर्ण, लाटू, गोरिल, रघुनाथ जैसे कई देवी-देवता यहाँ के लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र हैं। इनके पश्वा जब नाचते हैं, तो पूरा गाँव भक्तिभाव में डूब जाता है। यही है उत्तराखण्ड के धार्मिक लोकनृत्यों की खासियत!

बाजूबंद नृत्यगीत

क्या आप जानते हैं कि उत्तराखण्ड की महिलाओं के गीतों में बाजूबंद का क्या महत्व है? गढ़वाल में इसे बाजूबंद कहते हैं, जबकि कुमाऊँ में यही नृत्यगीत न्यौली नाम से जाना जाता है। ये गीत खासकर उन घसेरी (घास काटने वाली) और ग्वेरी (गाय चराने वाली) महिलाओं के बीच प्रचलित हैं, जो जंगलों में काम करते हुए अपने मन की बातें गीतों के जरिये कहती हैं।

बाजूबंद या न्यौली कोई सामूहिक गीत नहीं हैं, बल्कि ये संवाद वाले गीत होते हैं — यानी एक गायक गाता है और दूसरा जवाब देता है। इन गीतों की खासियत ये है कि ये डेढ़ चरण के होते हैं, जिनमें पहली लाइन और दूसरी लाइन का सीधा-सीधा कोई मतलब नहीं होता, बस तुक मिलाई जाती है। इनमें प्रेम और विरह के गीत ज्यादा होते हैं, जिन्हें अक्सर प्रेमी बुरांश, काफल या देवदार के पेड़ों के नीचे बैठकर गाते हैं।

झोड़ा नृत्य

कभी कुमाऊँ में बसंत आते ही आपने लोगों को गोल घेरा बनाकर नाचते देखा है? यही है झोड़ा नृत्य! ये नृत्य होली के बाद और बसंत ऋतु के स्वागत में किया जाता है। इसमें महिलाएं और पुरुष दोनों हिस्सा लेते हैं और प्रेम से भरे गीत गाते हुए गोल घेरा बनाकर नाचते हैं।

इस नृत्य में कोई उम्र की पाबंदी नहीं होती — बच्चे, जवान, बुज़ुर्ग सभी इसमें शामिल होते हैं। नृत्य का मजा तब और बढ़ जाता है जब बीच में खड़ा मुख्य गायक हुड़की बजाते हुए ताल देता है। पुरुष पारंपरिक चूड़ीदार पायजामा, सफेद कुर्ता, काली वास्केट और रंग-बिरंगा रूमाल कमर पर बांधकर सिर पर रंगीन चादर लपेटते हैं।

झोड़ा में गाये जाने वाले गीतों को ही झोड़ा गीत कहते हैं और इनमें भी प्यार और श्रृंगार का रंग साफ झलकता है।

नट-नटी नृत्यगीत

क्या कभी आपने किसी गाँव के मेले या शादी में पेशेवर नर्तकों को नाचते-गाते देखा है? तो हो सकता है आपने नट-नटी नृत्यगीत भी देखा हो! डॉ. शिवानंद नौटियाल बताते हैं कि इस नृत्य में हास्य-रस की भरपूर झलक होती है और इसकी कहानियाँ गाँव के रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी होती हैं। आमतौर पर बद्दी और मिरासी जाति के लोग ही इसे पेशेवर तौर पर करते हैं। ये जब भी कहीं कार्यक्रम पेश करते हैं, तो बीच में हंसी-मज़ाक के लिए नट-नटी नृत्यगीत जरूर दिखाते हैं। गाँव के लोग भी इसे खूब पसंद करते हैं, क्योंकि यह माहौल को हल्का और मनोरंजक बना देता है।

चौफला नृत्य (चमफुली नृत्य)

क्या आप जानते हैं चौफला नृत्य की कहानी भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी है? ‘चौ’ यानी चारों तरफ और ‘फुला’ यानी फूलों से खिल जाना। कहा जाता है कि माता पार्वती ने गढ़वाल के पहाड़ों में अपनी सखियों के साथ चौरी (चौपाल) बनाकर यह नृत्य किया था। उनके नृत्य से चारों तरफ फूल खिल गए थे और भगवान शिव प्रसन्न होकर उनसे विवाह के लिए राज़ी हुए थे। तभी से यह नृत्य चौफला या चमफुली के नाम से मशहूर हो गया।

गढ़वाल में यह नृत्य महिलाएं और पुरुष दोनों मिलकर करते हैं — कभी साथ में, कभी अलग-अलग टोली बनाकर। इसमें ढोल-दमाऊ जैसी कोई चीज़ नहीं बजती। इसकी ताल ताली की आवाज़, पैरों की थाप और गहनों की खनक से ही बनती है। चौफला को आप गुजरात के गरबा जैसा कह सकते हैं। खुले मैदान में किया जाने वाला यह नृत्य थड़या नृत्य जैसा ही होता है, बस इसमें पुरुष भी हिस्सा लेते हैं। इसकी कई शैलियाँ हैं — जैसे खड़ा चौफला, जिसमें नर्तक तेज़ गति से ठुमकों के साथ नाचते हैं और लालुड़ी चौफला, जिसमें नर्तक गोल घेरे में दो दल बनाकर नाचते हैं।

झुमैलो नृत्य

बसंत पंचमी से लेकर विषुवत संक्रांति तक कुमाऊँ के गाँवों में झुमैलो की धुन सुनाई देती है। नाम से ही समझ आता है — झूमना! जब विवाहित बेटियाँ अपने मायके आती हैं तो अपनी खुशियों को दिखाने के लिए इस नृत्य को झूम-झूमकर करती हैं। झुमैलो में बेटियों का मायके से अटूट प्रेम झलकता है।

यह नृत्य किशोरियाँ गोल घेरा बनाकर करती हैं — कंधों में हाथ डालकर थोड़ा झुकते हुए कदमों को आगे-पीछे करती हैं और गाती हैं। झुमैलो गीतों की खासियत है कि हर पंक्ति के अंत में ‘झुमैलो’ शब्द आता ही आता है, जो गीत को और भी मधुर बना देता है।

थड़िमा या थड़या नृत्य

क्या आप जानते हैं कि गढ़वाल के गाँवों में जब बसंत पंचमी से लेकर बिखोत (विषुवत संक्रांति) तक महिलाएं मिलकर आँगन में गीत गाते हुए नाचती हैं, तो इसे थड़िमा या थड़या नृत्य कहते हैं? यह लास्य शैली का सबसे खूबसूरत नृत्य माना जाता है। खासकर भोटिया समुदाय की महिलाएं इसे बहुत प्रेम से करती हैं। मायके आई बेटियाँ भी अपनी सहेलियों के साथ घर के आँगन या चौक में गोल घेरा बनाकर थड़िया गीत गाते हुए नृत्य करती हैं। इसमें गीत और नृत्य के संग मिलकर एक अलग ही उमंग का माहौल बनता है।

छोलिया नृत्य

कुमाऊँ का नाम आते ही छोलिया नृत्य की छवि मन में उभर ही आती है! यह यहाँ का सबसे प्रसिद्ध और वीरता से भरा नृत्य है। यह कुछ-कुछ गढ़वाल के सरौं और पौणा नृत्य जैसा ही है। छोलिया नृत्य मुख्य रूप से शादी-ब्याह, धार्मिक आयोजनों या कृषि मेलों में ढोल और तलवार के साथ किया जाता है। इसमें नागराजा, नरसिंह और पाण्डवों की वीर लीलाएँ दिखाई जाती हैं।

कुमाऊँ की शौका जनजाति में यह नृत्य पहले से प्रचलित था, लेकिन अब यह आम लोगों में भी लोकप्रिय होता जा रहा है। शादी या बड़े आयोजन में छोलिया नृत्य न हो तो मजा ही अधूरा लगता है। यही वजह है कि आज यह नृत्य यहाँ के कलाकारों के लिए रोज़गार का एक मजबूत साधन भी बन गया है।

मयूर नृत्य

क्या आपने कभी सोचा है कि पहाड़ों में घास काटती महिलाएं कैसे अपनी थकान को भूल जाती हैं? इसके पीछे एक खूबसूरत वजह है — मयूर नृत्य। ये नृत्य-गीत खासतौर पर घसियारी महिलाओं के बीच प्रचलित हैं।

पहाड़ की महिलाओं का जीवन कितना मेहनत भरा होता है — घर के काम से लेकर खेत-खलिहान, जंगल से लकड़ी और घास लाना, सब कुछ उन्हें ही करना होता है। ऐसे में जब वो जंगल में घास काटने जाती हैं, तो आपस में मिलकर मयूर नृत्यगीत गाती हैं। ये गीत नाचते हुए मोर की तरह थिरकने वाले होते हैं, जिनसे थकावट भी दूर होती है और मन भी खिल उठता है। यही तो इन गीतों की सबसे बड़ी खूबी है!

बासंती नृत्य

क्या कभी आपने महसूस किया है कि बसंत आते ही मन अपने आप नाच उठता है? ठंडी हवाएँ, पेड़ों पर नई कोपलें, फूलों की महक और हर तरफ हरियाली — यही सब मिलकर बासंती गीतों और नृत्य को जन्म देते हैं। जब इंसान इस ऋतु के उल्लास में डूबकर नृत्य करता है, तो उसे ही बासंती नृत्य कहा जाता है। गाँव की महिलाएँ और पुरुष खेतों में या खुले मैदान में मिलकर ये नृत्य करते हैं और बसंत के स्वागत में गीत गाते हैं।

भड़ौ या पवाड़ा नृत्य

कभी वीरों की गाथाएँ सुनी हैं? उत्तराखण्ड में इन्हीं वीरों की कहानियों को जब गीतों और नृत्य के रूप में सुनाया जाता है, तो उसे भड़ौ या पवाड़ा नृत्य कहते हैं। ‘भड़ौ’ शब्द का मतलब ही होता है वीर। गाँवों में अब भी लोग अपने वीर पूर्वजों की कहानियाँ बड़े गर्व से गाते हैं।

पवाड़ा नृत्य में गाँव के लोग ढोल-दमाऊ के साथ वीरों की गाथाएँ गाते हैं — चाहे वो ऐतिहासिक वीर हों या फिर लोककथाओं के नायक। इस नृत्य में वीरता, गर्व और शौर्य की झलक हर ताल में दिखती है।

पाण्डव नृत्य

उत्तराखण्ड और पाण्डवों का रिश्ता बहुत पुराना है। महाभारत में भी कहा गया है कि पाण्डवों ने अपने वनवास का लंबा हिस्सा यहीं बिताया था। आज भी यहाँ के कई गाँव, मेले और पर्व पाण्डवों की याद दिलाते हैं।

गढ़वाल का पाण्डव नृत्य उन्हीं कहानियों को जीवंत कर देता है। ये नृत्य खासतौर पर नवरात्रि में नौ दिन तक खुले मैदान में होता है। इसमें पाण्डवों के जीवन से जुड़े 20 अलग-अलग प्रसंगों को लोकनाट्य और नृत्य के जरिए पेश किया जाता है। ढोल के 32 अलग-अलग ताल और सैकड़ों स्वर मिलकर इसे खास बनाते हैं। जब गाँव के लोग पाण्डवों की कहानियाँ नाच-गाकर सुनाते हैं, तो पूरा माहौल महाभारत के समय में पहुँच जाता है।

हारूल नृत्य

क्या आप जानते हैं कि उत्तराखण्ड के पाण्डव नृत्यों में हारूल नृत्य का भी खास स्थान है? महाभारत में पाण्डवों के लंबे वनवास के किस्से उत्तराखण्ड की संस्कृति में रचे-बसे हैं। जौनसारी जनजाति का हारूल नृत्य इन्हीं कहानियों को लोकनृत्य के रूप में जीवित रखता है। इसमें खास बात यह है कि इसमें रमतुला नाम का वाद्ययंत्र जरूर बजाया जाता है, जिसकी धुन नृत्य को और भी रोचक बना देती है। जब गाँव के लोग हारूल नृत्य करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे पाण्डवों की गाथाएँ फिर से जीवित हो उठी हों।

होली नृत्य

होली तो सबको पसंद है! रंगों, पकवानों, हंसी-ठिठोली और भांग के बिना होली अधूरी लगती है। लेकिन उत्तराखण्ड में होली सिर्फ रंग खेलकर नहीं मनाई जाती — यहाँ लोग खास होली नृत्य भी करते हैं। ढोल-दमाऊ की ताल पर जब गाँव वाले पकवानों और ठिठोली के बीच नाचते हैं तो असली बसंती माहौल बनता है। यही नृत्य होली के असली उल्लास को दर्शाता है।

चांचरी नृत्य

क्या आप बसंत की चांदनी रात में गाँव के लोग गोल घेरा बनाकर गीत गाते हुए थिरकते देखना चाहेंगे? यही है चांचरी नृत्य! गढ़वाल और कुमाऊँ — दोनों जगहों में यह खूब होता है। इसमें स्त्री-पुरुष गोल घेरा बनाकर नाचते हैं और बीच में मुख्य गायक हुड़की बजाते हुए गीत गाता है। इसे कुमाऊँ में झोड़ा भी कहते हैं, लेकिन चांचरी की ताल झोड़ा से थोड़ी धीमी और सुरों से भरी होती है। चांचरी गीतों में कोई बंधन नहीं होता — इनके बोल बिल्कुल आज़ाद होते हैं।

घुघुती नृत्यगीत

उत्तराखण्ड का घुघुती त्यौहार खासकर बच्चों के लिए बड़ा प्यारा मौका होता है। इस मौके पर बच्चे पारंपरिक घुघुती नृत्यगीत गाते हुए नाचते हैं। कई जगहों पर विवाहित बेटियाँ भी इसे गाती हैं, जब वे मायके आती हैं। इस नृत्य में खुशी और बचपन की चहक साफ नजर आती है।

तलवार नृत्यगीत

तलवारों की खनक, ढोल की ताल और वीरता से भरे कदम — यही है उत्तराखण्ड का तलवार नृत्य। नाम से ही साफ है कि इसमें नर्तक हाथों में तलवार और अन्य शस्त्र लेकर नाचते हैं। यह नृत्य वीरता दिखाने और युद्ध कौशल को याद रखने के लिए किया जाता है। गाँवों के मेले या खास आयोजनों में लोग इसे देखना बहुत पसंद करते हैं।

केदार नृत्य

‘केदार’ नाम सुनते ही भगवान शिव की छवि आँखों में उभर आती है। यही वजह है कि केदार नृत्य पूरी तरह भगवान शिव की स्तुति के लिए किया जाता है। इसमें नर्तक शिवजी की महिमा गाते हैं और नृत्य के माध्यम से अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। यह नृत्य भगवान शिव के प्रति गढ़वाल के लोगों की अपार श्रद्धा का प्रतीक है।

घसियारी नृत्य

उत्तराखण्ड की घसियारी महिलाएँ — यानी घास काटने वाली मेहनती पहाड़ी स्त्रियाँ — अपने रोज़मर्रा के काम को भी उत्सव में बदल देती हैं। घास काटते वक्त या जंगल से लकड़ी लाते वक्त वो जो समूह में गीत गाकर नाचती हैं, उसे ही घसियारी नृत्य कहते हैं। यह नृत्य उनके थके हुए मन को खुशी देता है और काम को बोझ नहीं बनने देता। यही है घसियारी नृत्य की सबसे बड़ी खूबसूरती!

छोपती नृत्यगीत

क्या आपने कभी रवांई-जौनपुर की वादियों में प्रणय (प्रेम) से भरे गीत सुने हैं? छोपती नृत्यगीत वही हैं! इनमें प्रेमी-प्रेमिका आपस में संवाद करते हैं और गीतों में एक-दूसरे से अपनी बात कहते हैं। इस नृत्य में दिल की बातें गीत बन जाती हैं, और इन्हीं गीतों को छोपती गीत कहा जाता है।

छपेली नृत्यगीत

उत्तराखण्ड के गाँवों में जब लड़के-लड़कियाँ जोड़ों में नाचते हैं, तो उसे छपेली नृत्य कहते हैं। इसमें लड़कियाँ एक हाथ में रूमाल और दूसरे में आईना लेकर नाचती हैं — क्या दृश्य होगा! लड़के हुड़का, मंजिरा और बांसुरी बजाते हैं। पूरा माहौल प्रेम से भर जाता है। इस नृत्य के गीतों को ही छपेली गीत कहा जाता है।

सरौं नृत्यगीत

वीरता देखनी है तो सरौं नृत्य देखिए! यह नृत्य ढाल-तलवार और शस्त्रों के साथ किया जाता है। इसमें पुराने योद्धाओं की युद्ध कला का सुंदर प्रदर्शन होता है। गाँव के मेले और बड़े आयोजनों में इसे देखना रोमांच से भर देता है।

फौफती नृत्य

छोटे बच्चे जब अपनी मस्ती में गाना गाते और नाचते हैं, तो वो फौफती नृत्य कहलाता है। यह पहाड़ी बच्चों के मनोरंजन का पारंपरिक तरीका है — गाँव के आँगन में बच्चे एकत्र होकर फौफती गीतों के साथ खूब खेलते और झूमते हैं।

भैला-भैला नृत्य

दीपावली की रात उत्तराखण्ड के गाँवों में भैला जलाए जाते हैं — चीड़ की लकड़ी से बनी मशालें। बच्चे और बड़े मशाल लेकर जब करतब करते हुए नाचते हैं तो इसे भैला-भैला नृत्य कहा जाता है। यह दीपावली के उल्लास को कई गुना बढ़ा देता है।

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डल्यों नृत्यगीत

डल्यों नृत्यगीत थोड़ा अलग हैं। डॉ. शिवानंद नौटियाल बताते हैं कि इन गीतों में दुनिया की क्षणिकता — यानी कुछ भी हमेशा के लिए नहीं — को बड़ी खूबसूरती से कहा जाता है। नाचते-गाते लोग याद दिलाते हैं कि सब कुछ एक दिन चला जाता है।

जात्रा नृत्यगीत

देवभूमि में देवयात्रा के बिना कोई पर्व अधूरा है क्या? जात्रा नृत्यगीत खासतौर पर धार्मिक जुलूस या देवयात्रा के दौरान गाए और नाचे जाते हैं। श्रद्धालु देवताओं के गीत गाते हुए यात्रा पूरी करते हैं और नृत्य करते हैं।

बौछड़ों नृत्यगीत

बौछड़ों नृत्य को आप पहाड़ी ‘भांगड़ा’ कह सकते हैं! कार्तिक पूर्णिमा की रात बिनसर में इसे बड़े उत्साह से किया जाता है। लोग मस्ती में झूमते हैं, कोई हंसी मजाक वाला गीत गाता है तो कोई सुंदरियों की तारीफ करता है। माहौल पूरा उन्मुक्त और खुशियों से भरा होता है।

दूढ़ा नृत्यगीत

पुराने ज़माने में जब बेटियाँ अपने लिए वर खुद चुनती थीं, तो वो अवसर स्वयंवर कहलाता था। दूढ़ा नृत्य उसी पर आधारित है — इसमें गीत और नृत्य के माध्यम से उस जमाने के विवाह की झलक दिखाई जाती है।

तांदी नृत्यगीत

गढ़वाल में तांदी नृत्य काफी लोकप्रिय है। उत्तरकाशी और जौनपुर में इसे माघ महीने में किया जाता है। इसमें कोई भी नया विषय हो सकता है — किसी घटना पर, किसी मशहूर व्यक्ति पर या कोई धार्मिक बात। यही वजह है कि यह नृत्य हमेशा कुछ नया लेकर आता है।

लामण नृत्यगीत

अगर प्रेम की बातें सुननी हैं तो लामण नृत्यगीत जरूर सुनिए। ये गीत प्रेमी और प्रेमिका के बीच के मीठे संवाद होते हैं — प्रेमी अपनी प्रेमिका को मनाता है, उसे अपनी भावनाएँ समझाता है। गीतों में छुपा प्यार ही इसकी जान है।

सुई नृत्यगीत

क्या आपने कभी ऐसा नृत्य देखा है जिसमें नर्तक नाचते-नाचते अपनी कमर मोड़कर दाँतों से फर्श पर रखी सुई उठाता हो? यही है सुई नृत्य — नर्तक हाथों में थाली लेकर उसे कलात्मक ढंग से घुमाते हैं और सुई उठाने का करतब करते हैं। इसके लिए बड़ी कला और अभ्यास चाहिए होता है।

खुसौड़ा नृत्यगीत

‘खुसौड़ा’ शब्द का मतलब ही होता है — खुश रहना या खुशी-खुशी कोई काम करना। यही वजह है कि उत्तराखण्ड में जब गाँववाले किसी खुशी के मौके पर कोई काम नाचते-गाते करते हैं, तो उस नृत्य को खुसौड़ा नृत्य कहते हैं। शादी, फसल कटाई या कोई खुशी का अवसर — सब में खुसौड़ा गीत गूंजते हैं।

छूड़ा नृत्य

यह नृत्य थोड़ा अलग है — इसमें गीतों के ज़रिए नई पीढ़ी को अच्छे-बुरे में फर्क सिखाया जाता है। छूड़ा नृत्य में उपदेशात्मक बातें, नैतिक संदेश और जीवन का सार होता है। गाँव के बुज़ुर्ग इस नृत्य के जरिए बच्चों को जीवन के सही रास्ते बताते हैं।

बनजारा नृत्यगीत

बंजारों की ज़िन्दगी हमेशा चलते रहने वाली होती है — कहीं टिकाव नहीं, बस नया सफर। बनजारा नृत्यगीत बंजारों के इसी घुमक्कड़ जीवन, उनके अनुभवों और उनके जीवन के सकारात्मक नजरिए को गीत और नृत्य के रूप में दिखाते हैं।

चैती नृत्यगीत

गढ़वाल के औजी जाति के लोग देवालयों में ढोल, दमाऊ, रणसिंघा जैसे वाद्य बजाते हैं। जब ये लोग चैत महीने में पारंपरिक नृत्य करते हैं, तो उसे चैती नृत्यगीत कहा जाता है। ये गीत देवताओं की स्तुति और ऋतु के स्वागत के लिए गाए जाते हैं।

प्रभाति नृत्य

चैत का महीना आते ही गढ़वाल में प्रभाति नृत्य की गूंज सुनाई देती है। औजी जाति के लोग चैत के पहले दिन सुबह-सुबह प्रभाति नृत्य करते हैं। ये गीत नए मौसम और नई उम्मीदों का स्वागत होते हैं।

श्यामा कल्याणी

औजी जाति के लोग चैत माह के पहले दिन संध्या के समय जब भगवान की उपासना करते हुए नाचते-गाते हैं, तो उसे श्यामा कल्याणी कहा जाता है। इसमें भक्ति और लोक परंपरा का सुंदर संगम होता है।

चैती पसारा

चैती पसारा औजी जाति के लोग अपने यजमानों के सामने करते हैं। नृत्य-गीत सुनाने के बदले यजमान इन्हें दान-दक्षिणा देते हैं। इसे आप आशीर्वाद और आभार का सांस्कृतिक तरीका कह सकते हैं।

धियाणा का चैतो पसारा

धियाणा मतलब विवाहित बेटी। जब किसी के घर बेटी के यहाँ बेटा पैदा होता है या कोई शुभ काम होता है, तब औजी लोग चैतो पसारा नृत्य लेकर बधाई देने जाते हैं — इसके बदले में परिवार उन्हें खुश होकर बख्शीश देता है।

कुलाचार नृत्य

यह भी चैती पसारा जैसा ही नृत्य है। फर्क बस इतना है कि इसमें औजी लोग अपने यजमान के कुल (परिवार) की प्रशंसा गाते हैं — उनके कुल की शोभा का बखान करते हैं और आशीर्वाद स्वरूप दक्षिणा लेते हैं।

लांग नृत्यगीत

लांग नृत्य में बद्दी जाति के लोग बांस के एक लंबे लट्टे पर करतब दिखाते हैं। बांस के ऊपर संतुलन बनाना और करतब करते हुए गीत गाना — यही इसकी खासियत है।

हुड़क्या नृत्यगीत

हुड़क्या नृत्य में हुड़का बजाते हुए अलग-अलग विषयों पर गीत गाए जाते हैं। कोई भी सामाजिक, धार्मिक या मनोरंजन का विषय इसमें शामिल हो सकता है — बस गीत और ताल मिलते रहें।

शिव-पार्वती नृत्यगीत

बद्दी जाति के लोग भगवान शिव और माता पार्वती की कहानियाँ जब गीतों में सुनाते और नाचते हैं, तो उसे शिव-पार्वती नृत्य कहा जाता है। इसमें शिव-पार्वती के प्रेम, विवाह और कथाएँ सुनाई जाती हैं।

सांपू नृत्य

गढ़वाल में नागराजा की पूजा बहुत लोकप्रिय है। बद्दी जाति के लोग नागराजा के जीवन से जुड़ी कथाएँ जब नाच-गाकर सुनाते हैं, तो उसे सांपू नृत्य कहते हैं। इसमें लोकविश्वास और नाग परंपरा दोनों की झलक मिलती है।

दीपक नृत्यगीत

दीपक यानी उजाला और शुभकामनाएँ। जब महिलाएँ दीपक लेकर किसी धार्मिक अवसर पर नाचती हैं, तो वो दीपक नृत्य कहलाता है। यह उजाले और खुशियों का प्रतीक है।

राधाखण्डी नृत्यगीत

राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं से सुंदर कोई कथा हो सकती है क्या? बद्दी और मिरासी जाति के लोग जब कृष्ण-राधा की प्रेम कहानियों को गीत और नृत्य में उतारते हैं, तो उसे राधाखण्डी नृत्य कहते हैं। इसमें भक्ति और प्रेम दोनों की मिठास घुली होती है।

जानें उत्तराखंड के कार्तिकेयपुर या कत्यूरी राजवंश के बारें में विस्तार से

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