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‘नन्हीं परी’ गैंगरेप-हत्याकांड: हल्द्वानी की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब

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हल्द्वानी: वर्ष 2014 में हुई मासूम ‘नन्हीं परी’ गैंगरेप और हत्या का मामला एक बार फिर से सुर्खियों में है। उत्तराखंड हाईकोर्ट से दोषी करार दिए गए मुख्य आरोपी अख्तर अली को सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद पूरे प्रदेश में आक्रोश फैल गया है। सोशल मीडिया से लेकर गांव-शहर तक लोग न्याय की मांग को लेकर आवाज बुलंद कर रहे हैं। इसी क्रम में 18 सितंबर को हल्द्वानी की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा।

बुद्ध पार्क में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, सामाजिक संगठन, महिलाएं और छात्र-छात्राओं के साथ उत्तराखंड के लोक कलाकार भी पहुंचे। यहां से लोगों ने आरोपी को फांसी की सजा देने की मांग उठाई। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर नारेबाजी की—“बेटी बचाओ, दोषी को फांसी दो।”

प्रदर्शनकारी जब बुद्ध पार्क से जुलूस निकालकर एसडीएम कोर्ट की ओर बढ़ने लगे तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस और भीड़ के बीच जोरदार नोकझोंक भी हुई। हालांकि भारी संख्या में जुटे लोगों के सामने पुलिस को पीछे हटना पड़ा और प्रदर्शनकारी सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय तक पहुंच गए। वहां उन्होंने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की।

प्रदर्शन में हल्द्वानी विधायक सुमित हृदयेश भी शामिल हुए। वहीं उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक कलाकार श्वेता महरा, इंदर आर्य, प्रियंका मेहरा और गोविंद दिगारी जैसे कलाकारों ने भी आम जनता के साथ खड़े होकर अपनी आवाज बुलंद की।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पीड़िता परिवार और पूरे प्रदेश की जनता का विश्वास न्यायपालिका से उठता दिख रहा है। उनका कहना था कि सात वर्षीय मासूम बच्ची के साथ हुई यह दरिंदगी ऐसी घटना थी जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया था। ऐसे में दोषियों को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए थी, लेकिन बरी होने का आदेश न्याय की उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा है।

मामला क्या है?

नवंबर 2014 में पिथौरागढ़ जिले की 7 वर्षीय बच्ची अपने परिवार के साथ काठगोदाम में एक रिश्तेदार की शादी में शामिल होने आई थी। शादी के दौरान बच्ची अचानक लापता हो गई। पांच दिन बाद उसका शव गौला नदी के किनारे जंगल से बरामद हुआ। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने यह खुलासा किया कि बच्ची के साथ पहले गैंगरेप किया गया और फिर निर्मम हत्या कर दी गई।

घटना ने प्रदेशभर में उबाल ला दिया था। जगह-जगह धरना और प्रदर्शन हुए। तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी मौके पर पहुंचकर लोगों को शांत करना पड़ा था। पुलिस जांच में तीन लोगों को आरोपी बनाया गया। इनमें से एक आरोपी मसीह को दोषमुक्त कर दिया गया था। लेकिन मुख्य आरोपी अख्तर अली को हाईकोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम और आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। जबकि दूसरे आरोपी प्रेमपाल को पांच साल की सजा और जुर्माना मिला था।

बाद में दोषियों ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए अख्तर अली को बरी कर दिया। इसी आदेश ने प्रदेशभर में लोगों के गुस्से को भड़का दिया है।

लोगों की मांग

जनता का कहना है कि ऐसे मामलों में त्वरित न्याय होना चाहिए और दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने सरकार और न्यायपालिका से अपील की है कि वे पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए उच्चतम स्तर पर पुनर्विचार याचिका दायर करें।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश में मासूम बेटियों की सुरक्षा और न्याय के लिए कानून पर्याप्त है या इसमें और बदलाव की जरूरत है। हल्द्वानी की सड़कों पर उमड़े जनसैलाब ने यह साफ कर दिया कि जनता अन्याय के खिलाफ चुप नहीं बैठेगी और ‘नन्हीं परी’ जैसी मासूम बेटियों को न्याय दिलाने के लिए लगातार संघर्ष करेगी।

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