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रुद्रप्रयाग मुख्यालय से 500 मीटर की दूरी, मगर विकास से मीलों दूर, विकास जहाँ ‘लोकेशन आउट ऑफ सर्विस’ बन जाता है

रुद्रप्रयाग मुख्यालय से 500 मीटर की दूरी, मगर विकास से मीलों दूर

रुद्रप्रयाग—एक ऐसा शहर जिसे लोग उसकी सुंदरता, शांति और आध्यात्मिक चमक के लिए जानते हैं। दो पवित्र नदियों का संगम स्थल, चमकते-बिखरते बाज़ारों से सजा हुआ जिला मुख्यालय, जहां हर कोना एक पहाड़ी शहर की खूबसूरती की मिसाल देता है। लेकिन इस चमक के पीछे छिपा है एक ऐसा बदसूरत कोना, जो हर बार विकास की कथाओं को झुठलाता है। जिला मुख्यालय से मात्र 500 मीटर दूर, एक सड़क है—तूना-बोंठा मार्ग, जो एक नहीं, कई गांवों की जीवनरेखा है। चिंगवाड़, घंडालिका और पीड़ा जैसे गांव इसी रास्ते से जुड़ते हैं, लेकिन अफसोस, यह मार्ग वर्षों से उपेक्षा और अनदेखी की मिट्टी में दबा पड़ा है।

बीते कुछ महीनों में जब सड़क की मरम्मत हुई तो उम्मीद जगी कि शायद अब हालात बदलेंगे। लेकिन जैसे ही काम इस 500 मीटर के हिस्से तक पहुंचा, विकास की सांसें उखड़ गईं। हर बार की तरह फिर वही दृश्य—मशीनें चलीं, कुछ टुकड़ों में बजरी बिछी, और जहां समस्या असल में जड़ जमाए बैठी है, वहां काम रुक गया। यह वही हिस्सा है जो सबसे ज्यादा खस्ताहाल है, लेकिन सबसे ज्यादा उपेक्षित भी। समझ नहीं आता कि जब पूरा मार्ग सुधर सकता है तो यही छोटा हिस्सा हर बार बजट की सीमा से बाहर क्यों हो जाता है? क्या सरकारी योजनाएं भी अब GPS पर चलती हैं, जहां मुख्यालय से 500 मीटर दूर जाना ‘लोकेशन आउट ऑफ सर्विस’ बन जाता है?

इस सड़क पर जिले के कुछ बड़े अधिकारियों के आवास भी हैं। वे भी रोज़ इसी राह से गुज़रते हैं। लेकिन शायद उनके वाहन की बंद खिड़कियों और सत्ता के रुतबे के बीच सड़क की हालत दिखाई नहीं देती। वे जानते हैं, देख भी रहे हैं, लेकिन चुप हैं। चुप्पी अब एक आदत बन चुकी है—पद की गरमी में संवेदनाएं पिघल जाती हैं, और रह जाता है सिर्फ मौन।

यह कोई नई कहानी नहीं है। वर्षों से यह मुद्दा पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाया जा रहा है। आवाज़ें उठती हैं, ज्ञापन सौंपे जाते हैं, फोटू खिंचते हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। सड़क के साथ-साथ मांगें भी हर बार मिट्टी में दबा दी जाती हैं—जैसे रोज़ इस सड़क पर मिट्टी डालकर गड्ढों को ढंका जाता है, अस्थायी रूप से, झूठी तसल्ली के साथ।

अब जब मानसून की आहट है, तो यह मार्ग फिर सड़क कम, और नाला ज्यादा बन जाएगा। बरसात का पानी बहेगा, मिट्टी सड़कों पर तैरती दिखेगी। मगर बर्फ की तरह जम चुकी सरकारी संवेदनाएं शायद बारिश में भी नहीं पिघलेंगी।

यह मुद्दा नगर निकाय चुनावों में भी उठा। बड़ी-बड़ी बातें हुईं, दावे किए गए, वादे किए गए कि अबकी बार हालात बदलेंगे। लेकिन जैसे ही मतगणना खत्म हुई, विकास फिर उसी गड्ढे में जा गिरा, जहां से वो कभी निकला ही नहीं था। प्रशासन की फाइलें फिर उसी रफ़्तार से दबा दी गईं, जिस रफ्तार से इस सड़क पर हर दिन कोई स्कूटर वाला धूल में लिपटकर गिरता है।

सोचिए, जब जिला मुख्यालय के बिल्कुल करीब के क्षेत्र का ये हाल है, तो दूर-दराज़ की उम्मीदें कितनी खोखली होंगी। जनता की आवाज़ें किस ताकतवर कानों तक पहुंचती हैं, और कब पहुंचती हैं—ये सवाल अब मज़ाक लगने लगे हैं। तूना-बोंठा मार्ग में मौजूद डांगसेरा की यह सड़क, महज एक अधूरी सड़क नहीं है। ये एक प्रतीक है—उस सिस्टम का, जहां योजनाएं विज्ञापनों में पूरी होती हैं और ज़मीन पर बस कुछ मीटर चलने से पहले दम तोड़ देती हैं।

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