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रुद्रप्रयाग आपदा: सात दिन बाद भी नहीं निकाले गए मलबे में दबे लोग, सरकार व प्रशासन फेल

रुद्रप्रयाग आपदा: सात दिन बाद भी नहीं निकाले गए मलबे में दबे लोग, सरकार व प्रशासन फेल

रुद्रप्रयाग। 29 अगस्त को बसुकेदार क्षेत्र में आई भीषण आपदा ने पूरे जिले को दहला दिया था। बड़ेथ, स्यूर डांगर और छेनागाड़ जैसे इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए। खासकर छेनागाड़ – जो कभी एक चहलपहल भरा बाजार और विश्वनाथ सेवा का आखिरी स्टॉप था – आज मलबे का ढेर बन चुका है।

सूत्रों के अनुसार, यहां 8–9 लोग अब भी मलबे में दबे हुए हैं, जबकि कुछ लोगों को पहले दिन ही प्रशासन ने रेस्क्यू कर लिया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि घटना को सात दिन बीत जाने के बाद भी मलबे में दबे लोगों को बाहर निकालने के लिए जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

“सरकार-प्रशासन फेल है” – त्रिभुवन चौहान

स्थानीय नेता त्रिभुवन चौहान ने प्रशासन की निष्क्रियता पर सीधा हमला बोलते हुए कहा –
“हमारी सरकार और प्रशासन पूरी तरह फेल है, ये लोग बिल्कुल बेपरवाह हैं। 29 की सुबह से लेकर अब तक एक भी व्यक्ति को मलबे से नहीं निकाला गया। पहले दिन कुछ गतिविधियां हुई थीं, लेकिन उसके बाद यहां कुछ भी नहीं हो रहा। घराली में 100–150 NDRF, DDRF और आर्मी की फोर्सेस तैनात हैं, लेकिन छेनागाड़ में न तो कोई जागरूकता है और न ही सक्रियता।”

उन्होंने आगे कहा –
“दो-दो विधायक इस क्षेत्र से हैं, लेकिन दोनों ने शायद यह प्रण ले लिया है कि यहां कुछ नहीं करना। अगर सरकार अगले दो दिन में मलबा हटाने का काम शुरू नहीं करती, तो हम 8 सितंबर से गैंती, फावड़ा और कुदाल लेकर खुदाई का काम स्वयं शुरू कर देंगे।”

मशीनरी नहीं, मैनुअल डिगिंग भी नहीं

प्रशासन का तर्क है कि सड़कें क्षतिग्रस्त होने के कारण भारी मशीनें मौके तक नहीं पहुँच पा रही हैं। लेकिन सवाल ये है कि पिछले सात दिनों में मैनुअल डिगिंग तक क्यों नहीं शुरू हुई?
स्थानीय लोग गुस्से में हैं कि उनके अपनों को मलबे से निकालने की कोई ईमानदार कोशिश अब तक नहीं हुई।

सख्त सवालों के घेरे में सरकार और प्रशासन

अब जबकि 6 सितंबर हो चुकी है, लोग पूछ रहे हैं –

  • क्या आपदा पीड़ितों की जान इतनी सस्ती है कि उन्हें मलबे में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाए?
  • प्रशासन केवल हेलीकॉप्टर से राशन भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रहा है?
  • सात दिन में भी रेस्क्यू न होना क्या सरकार और प्रशासन की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत नहीं है?

ग्रामीणों का कहना है कि अब उनकी धैर्य की सीमा टूट रही है। अगर जल्द ही राहत व बचाव कार्य तेज नहीं होते तो स्थानीय लोग खुद फावड़े लेकर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करेंगे।


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