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क्या मौतों की गिनती पूरी होने के बाद जागता है वन विभाग?

क्या मौतों की गिनती पूरी होने के बाद जागता है वन विभाग?

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद का जखोली ब्लॉक बीते कई वर्षों से गुलदारों के आतंक से जूझ रहा है। लेकिन हालिया घटनाएं साबित करती हैं कि अब यह आतंक सहनशीलता की सीमा पार कर चुका है। बीते दो महीनों में गुलदार के हमले से तीन महिलाएं जान गंवा चुकी हैं, और कुल मिलाकर दस से अधिक महिलाओं पर हमले हो चुके हैं।

सबसे ताज़ा और झकझोर देने वाली घटना मंगलवार को मखेत गांव में हुई, जहाँ 65 वर्षीय रामेश्वरी देवी अपने ही घर की रसोई में खाना बना रही थीं, जब गुलदार ने घर में घुसकर उन पर हमला किया और मौत के घाट उतार दिया।

जरा सोचिए—अगर घर की दीवारें भी अब महिलाओं की रक्षा नहीं कर सकतीं, तो वन विभाग की चेतावनी किस काम की?

जखोली की माओं और बहनों की चीखें अब सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, एक सिस्टम पर सवाल हैं।

लचर तंत्र, लापरवाह विभाग

बीते दो माह पहले देवल गांव की ईश्वरी देवी, फिर 30 मई को डांडा चमसारी में रूपा देवी और अब मखेत की रामेश्वरी देवी। घटनाएं सामने हैं, लोग सड़कों पर हैं, गांवों में कोहराम मचा है, और वन विभाग अब भी जागरूकता अभियान और मुआवज़े की चादर में खुद को ढांप रहा है।

बुधवार को भी आक्रोशित ग्रामीणों ने वन विभाग के खिलाफ मयाली बाजार में विरोध प्रदर्शन किया। मगर यह केवल विरोध नहीं थी, समाज की लचर तंत्र के खिलाफ एक चीख है कि बस करो! अब और नहीं!

क्या सिर्फ गुलदार को मार गिराना ही समाधान है?

आज की खबर है कि आदमखोर गुलदार को ढेर कर दिया गया है। लेकिन क्या यह पर्याप्त है?
जब पहली घटना हुई थी, तभी तंत्र सक्रिय क्यों नहीं हुआ?
हर बार क्यों इंतजार किया जाता है कि कोई और मारा जाए, तब जाकर एक्शन लिया जाएगा?

वन विभाग को यह समझना होगा कि गुलदार सिर्फ तब खतरा नहीं होता जब वह पहली बार हमला करता है, बल्कि तब भी होता है जब वह क्षेत्र में लगातार दिख रहा हो और घात लगाए बैठा हो।

क्यों नहीं होती हर गुलदार की वैज्ञानिक ट्रैकिंग?

वन विभाग को ये बताना होगा कि:

  • जब यह विदित है कि वृद्ध और अशक्त गुलदार इंसानों को आसान शिकार मानते हैं, तो क्यों नहीं हर गुलदार की उम्र और चाल-ढाल की ट्रैकिंग की जा रही है?
  • क्या कारण है कि क्षेत्र में मौजूद प्रत्येक गुलदार का व्यवहारिक मूल्यांकन नहीं हो रहा है?
  • आखिर वन विभाग की “प्रतिक्रिया नीति” इतनी ढीली क्यों है?

सिर्फ गुलदार को मार देना, सिर्फ मुआवज़ा दे देना, सिर्फ सभा बुला लेना, इनसे दर्द का अंत नहीं होता। समाधान तब होगा जब हर गांव सुरक्षित होगा, और हर महिला को यह भरोसा होगा कि उसका घर आखिरी दीवार है, आखिरी सुरक्षा है, ना कि आखिरी श्वास।

उत्तर चाहिए, सिर्फ संवेदना नहीं

सरकार, शासन और विशेष रूप से वन विभाग को अब जवाब देना होगा, क्यूंकि तंत्र हर बार ज्वलंत मुद्दों पर दो-चार दिन गंभीरता दिखता है फिर पल्ला झाड़ देता है। यह घटना सिर्फ जखोली की नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड की है। क्यूंकि इन्हीं गुलदारों के हमले से बचने के लिए देखा गया है कि शासन दो-चार दिन स्कूलों की छुट्टी दे देता है, लोगों को अकेले न जाने की हिदायत देता है। मगर समाधान, सुरक्षा और चिकित्सीय सुविधा के लिए ठोस कदम नहीं उठाता और सबसे प्रमुख सवाल- आखिर एक गुलदार कब आदमखोर बनता है, और उससे पहले तंत्र क्यों नहीं जागता?

क्यूंकि यह सिर्फ आदमखोर गुलदार की बात नहीं है, यह एक प्रशासनिक मानसिकता की बात है जो तब तक नहीं हिलती जब तक लाशें नहीं गिरतीं।

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