Shukrvaar Vrat Katha: जानें शुक्रवार व्रत की कथा के बारें में

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Shukrvaar Vrat Katha: हिंदू धर्म में व्रत-उपवास का विशेष महत्व है। इन्हीं व्रतों में से एक है शुक्रवार का व्रत, जिसे विशेषकर संतोषी माता के प्रति श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है। इस व्रत को करने से जीवन में संतोष, सुख-शांति और समृद्धि आती है। इस व्रत की कथा अत्यंत प्रेरणादायक है, जो हमें श्रद्धा, सेवा, धैर्य और कर्म का गूढ़ संदेश देती है।

प्रारंभिक कथा – एक परिवार की स्थिति

पौराणिक कथा के अनुसार, एक वृद्धा थी जिसके सात बेटे थे। उनमें से छह बेटे बहुत ही मेहनती, कर्मठ और कमाने वाले थे। परंतु सातवां बेटा अत्यंत निकम्मा, आलसी और अकुशल था। वह कोई काम नहीं करता था और दिनभर घर पर पड़े रहकर अपना समय नष्ट करता था।

इस कारण उसकी माँ उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखती थी। वह छह मेहनती बेटों को अच्छे पकवान बनाकर खिलाती थी, जबकि निकम्मे बेटे को झूठा भोजन यानी बाकी भाइयों की बची-खुची थाली ही दी जाती थी।

पत्नी की चिंता और सच का खुलासा

निकम्मे बेटे की पत्नी एक दिन अपने पति से बोली – “तुम्हारी माँ तुम्हारे साथ भेदभाव करती हैं। वे तुम्हें जो खाना देती हैं, वह सब बचा-खुचा होता है।”

परंतु पति को इस पर विश्वास नहीं हुआ। फिर एक दिन पत्नी की बात पर संदेह दूर करने के लिए उसने सिरदर्द का बहाना बनाकर रसोईघर में चादर ओढ़कर लेटना शुरू किया।

मां ने पहले छह बेटों को गरमागरम भोजन परोसा और जैसे ही सातवें बेटे की बारी आई, उसने सबकी झूठन को इकट्ठा कर सातवीं थाली में परोस दिया और बेटे को बुलाया।

यह दृश्य देखकर वह बेटे का दिल टूट गया। उसने भोजन करने से इनकार कर दिया और घर छोड़कर परदेश जाने का निर्णय लिया।

विदा के समय भावनात्मक संवाद

जब वह घर छोड़कर निकलने लगा तो उसे अपनी पत्नी की चिंता हुई। वह उस समय आंगन में गोबर के उपले बना रही थी। पति ने कहा—
“मैं परदेश जा रहा हूँ, कुछ समय बाद लौटूंगा। तुम धैर्य से रहो, धर्म का पालन करती रहो।”

पत्नी ने उत्तर दिया—
“आप चिंता न करें, मैं भगवान भरोसे रहूंगी। ईश्वर आपको सहायता देंगे।”

पति ने पत्नी से कोई निशानी मांगी तो उसने कहा कि मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं, सिर्फ यह गोबर से सने हाथ हैं, इनकी छाप ही तुम्हारे साथ रहेगी।

पति ने भी अपनी अंगूठी पत्नी को निशानी स्वरूप दी और गोबर की छाप अपनी पीठ पर लेकर वह परदेश के लिए रवाना हो गया।

परदेश में संघर्ष और सफलता

जब वह परदेश पहुंचा तो एक सेठ के पास नौकरी मांगी। सेठ ने कहा—
“जैसा काम, वैसा दाम मिलेगा।”

वह काम करने लगा। समय बीतने के साथ उसकी कड़ी मेहनत, ईमानदारी और समर्पण ने उसे सबका प्रिय बना दिया।

धीरे-धीरे सेठ ने उस पर भरोसा करना शुरू किया और बहीखाता (लेखाजोखा) उसके हाथों में सौंप दिया।

कुछ समय बाद उसकी योग्यता और ईमानदारी देखकर सेठ ने उसे मुनाफे में हिस्सेदार भी बना लिया।

उधर पत्नी की पीड़ा

इधर गांव में उसकी पत्नी की स्थिति बहुत खराब हो गई थी। उसकी सास और जेठानियों ने उसे तंग करना शुरू कर दिया।
वह सारा घर का काम करती और खाने को मुश्किल से सूखी रोटी मिलती।

एक दिन वह पास के जंगल में लकड़ियां बीनने गई, तभी उसने देखा कि कुछ स्त्रियाँ व्रत कथा सुन रही हैं।

उसने पूछा— “आप किस व्रत की कथा कर रही हैं?”
महिलाओं ने बताया— “यह संतोषी माता का व्रत है।”

उसने संतोषी माता का व्रत करना शुरू किया। हर शुक्रवार को वह गुड़ और चना का प्रसाद बनाती, व्रत करती और कथा सुनती।

माता की कृपा और चिट्ठी का आना

कुछ ही सप्ताह में माता की कृपा से उसे पति की चिट्ठी और पैसे आने लगे।

अब उसने माता से प्रार्थना की—
“हे मां! कृपा करके मुझे मेरे स्वामी से मिला दो।”

मां संतोषी ने एक वृद्धा का रूप धारण कर उसके पति के पास जाकर कहा—
“बेटा, क्या तुम्हारा कोई घर है?”

उसने कहा—
“हां है, पर इस काम को छोड़ूं कैसे?”

वृद्धा बोली—
“कल माता संतोषी के नाम का दीप जलाकर दुकान पर बैठना, सारा हिसाब चुक जाएगा।”

उसने ऐसा ही किया और माता की कृपा से व्यापार में लाभ हुआ। वह गहने-कपड़े खरीदकर अपने गांव की ओर रवाना हो गया।

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मिलन की अद्भुत योजना

उधर पत्नी भी रोज की तरह माता के मंदिर में बात कर रही थी।
मां ने कहा—
“बेटी, लकड़ियों की तीन गठरियां बनाओ—
एक को नदी किनारे,
दूसरी मंदिर में,
तीसरी घर में पटकते हुए कहो – ‘लो सासूजी, लकड़ियों की गठरी और भूसी की रोटी दो।’”

उसने ऐसा ही किया।

पति जैसे ही नदी पार कर रहा था, वहां उसे सूखी लकड़ियां दिखीं, जिससे उसने आग जलाई और खाना बनाया।

घर पहुंचने पर उसने वही शब्द सुने –
“लो सासूजी, लकड़ी की गठरी और भूसी की रोटी।”

वह आवाज पहचान गया और बाहर आया। पत्नी को देखकर उसकी आंखें भर आईं। उसने अपनी मां से पूछा कि वह इस दशा में क्यों है?

मां ने जवाब दिया—
“यह कुछ काम नहीं करती, हर वक्त घूमती रहती है।”

परंतु बेटा अब समझ चुका था। उसने मां से अलग घर की चाबी ली और पत्नी के साथ रहने लगा।

उद्यापन में हुई गलती

समय बीता और शुक्रवार आया जब माता के व्रत का उद्यापन (समापन विधि) करना था।

बहू ने पूरी तैयारी की, गुड़-चना, ब्राह्मण और बच्चों को बुलाया। परंतु जेठानी ने अपने बच्चों को खटाई (खट्टी चीज) मांगने के लिए उकसाया।

जब बच्चों ने खटाई मांगी, तो बहू ने मना किया और प्रसाद में केवल गुड़-चना ही दिया।

बच्चों ने व्रत के पैसों से बाहर जाकर खट्टी चीज खरीदकर खा ली। इससे उद्यापन अपूर्ण हो गया और माता रुष्ट हो गईं।

पति की गिरफ़्तारी और बहू की पुकार

माता के क्रोधित होते ही पति को राजा के सैनिकों ने बंदी बना लिया।

फिर जेठ-जेठानी ने ताना मारा—
“बहुत पैसे कमा लिए, अब जेल में सड़ेगा।”

बहू यह सब सहन नहीं कर पाई और माता के चरणों में गिर पड़ी—
“मां! मुझे और मेरे पति को किस बात की सजा मिल रही है?”

माता बोली—
“बेटी, तुमने व्रत का उद्यापन ठीक से नहीं किया। अब पुनः विधिपूर्वक करो।”

दूसरी बार विधिपूर्वक उद्यापन

अब उसने ब्राह्मण के बेटे को बुलाकर विधिपूर्वक व्रत का उद्यापन किया।

इस बार उसने पैसों के बदले फल दिए, और प्रसाद में कोई खटाई नहीं आने दी।

माता प्रसन्न हुईं, और पति को जेल से रिहाई मिल गई।

परिवार में सुख और पुत्र का जन्म

माता की कृपा से बहू ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।

अब पूरा परिवार संतोषी माता का भक्त हो गया और हर शुक्रवार को विधिवत पूजा-व्रत करने लगा।

परिवार में प्रेम, शांति और समृद्धि का वास हो गया।

शिक्षा और संदेश

इस व्रत कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि—

  • धैर्य, ईमानदारी और श्रद्धा से हर संकट को पार किया जा सकता है।

  • मां संतोषी की भक्ति से घर में संतोष, प्रेम और सुख बना रहता है।

  • उद्यापन में खटाई का प्रयोग वर्जित है।

  • स्त्रियों को उपेक्षा नहीं, सहयोग और सम्मान देना चाहिए।

संतोषी माता का व्रत करने से हर प्रकार की समस्या दूर होती है और मन में शांति आती है। यह व्रत विशेषकर शुक्रवार को किया जाता है, और इसमें गुड़ व चना का ही प्रसाद चढ़ाना अनिवार्य है।

व्रतकर्ता को चाहिए कि वह सच्चे मन से नियमों का पालन करे और माता की कथा सुने।

इस कथा के अनुसार माता भक्तों की रक्षा अवश्य करती हैं और उनका जीवन सुखमय बनाती हैं।

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