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घेस गांव: उत्तराखंड का हर्बल हब बनकर जड़ी-बूटी कृषिकरण में देश को दे रहा नई दिशा

घेस गांव: उत्तराखंड का हर्बल हब बनकर जड़ी-बूटी कृषिकरण में देश को दे रहा नई दिशा

श्रीनगर, उत्तराखंड:  चमोली जिले के गोपेश्वर से लगभग 145 किलोमीटर दूर स्थित घेस गांव, त्रिशूल पर्वत की तलहटी में बसा एक ऐसा स्थान है, जो उत्तराखंड के “हर्बल हब” के रूप में तेजी से उभर रहा है। घेस गांव जड़ी-बूटी कृषिकरण के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर देश-विदेश में चर्चित हो गया है। राज्य सरकार, राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत उत्तराखंड को हर्बल गांवों से भरपूर एक हर्बल हब में बदलने के प्रयास कर रही है।

उत्तराखंड के हर्बल गांव घेस को मिला हैप्रेक का सहयोग

गढ़वाल विश्वविद्यालय के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) ने घेस गांव को जड़ी-बूटी कृषिकरण में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हैप्रेक के निदेशक, डॉ. विजयकांत पुरोहित के अनुसार, वर्ष 2001-2002 में संस्थान के वैज्ञानिकों ने घेस गांव के जलवायु अनुकूलता को देखते हुए कुटकी की खेती की शुरुआत की थी। इसके बाद, धीरे-धीरे अन्य ग्रामीण भी जुड़ते गए, जिससे गांव में जड़ी-बूटियों का उत्पादन बढ़ने लगा।

घेस गांव में जड़ी-बूटी कृषिकरण का तेजी से विस्तार

घेस गांव में कुटकी के साथ ही हिमालयी जड़ी-बूटियाँ जैसे अतीश और चिरायता का भी सफलतापूर्वक उत्पादन हो रहा है। वर्तमान में, गांव के 182 किसान लगभग 12 से 15 हेक्टेयर भूमि पर जड़ी-बूटियों का कृषिकरण कर हर साल 100 क्विंटल से अधिक कुटकी का उत्पादन करते हैं, जिससे 4-5 करोड़ रुपये की आय होती है।

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डाबर इंडिया का समर्थन और प्रशिक्षण

डाबर इंडिया लिमिटेड के सहयोग से, स्थानीय किसानों को जड़ी-बूटी कृषिकरण में आधुनिक और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। डाबर इंडिया के डॉ. पंकज प्रसाद रतूडी के प्रयासों से किसानों को और अधिक लाभ मिल सकेगा।

घेस गांव का महत्व और भविष्य

घेस गांव की हर्बल खेती की बढ़ती मांग के कारण, देश-विदेश की कई कंपनियाँ यहाँ से कुटकी खरीद रही हैं। इसने न केवल स्थानीय ग्रामीणों की आय में वृद्धि की है, बल्कि घेस गांव को एक आदर्श *उत्तराखंड हर्बल गांव* के रूप में भी प्रतिष्ठित कर दिया है। इसके अलावा, इस पहल से उत्तराखंड का *हर्बल हब* बनने का सपना भी साकार हो रहा है।

घेस गांव का यह प्रयास न केवल उत्तराखंड की हर्बल खेती की उन्नति को दर्शाता है बल्कि भविष्य में देश के अन्य गांवों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी बन सकता है।

 

 

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